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Chapter 2 - मेरी साइकिल सीखने की कहानी

जब मैं छोटा था, तब मेरे मोहल्ले के लगभग सभी बच्चे साइकिल चला लेते थे। हर शाम जब मैं बाहर निकलता, तो देखता कि मेरे दोस्त और आसपास के लड़के बड़ी आसानी से साइकिल चलाते थे। कोई तेज़-तेज़ चला रहा होता, कोई एक हाथ से चला रहा होता, तो कोई तो बिना हाथ लगाए भी साइकिल चलाने की कोशिश करता था।

मैं दूर खड़ा होकर उन्हें देखता रहता था। मन करता था कि मैं भी उनकी तरह साइकिल चलाऊं, लेकिन मुझे साइकिल चलानी नहीं आती थी। जब भी मैं कोशिश करता, मैं गिर जाता था।

धीरे-धीरे मुझे शर्म भी आने लगी थी। कई बार कुछ लड़के मेरा मजाक उड़ाते थे। वो हंसते हुए कहते, “अरे, तुमसे नहीं होगा, रहने दो।” उनकी ये बातें मुझे अंदर से दुख देती थीं, लेकिन मैं कुछ बोल नहीं पाता था।

एक दिन मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया। अगर मैं ऐसे ही डरता रहा, तो मैं कभी साइकिल नहीं सीख पाऊंगा। उस दिन मैंने ठान लिया कि अब चाहे जितनी बार गिरना पड़े, मैं साइकिल सीखकर ही रहूंगा।

मैंने अपने एक दोस्त से उसकी साइकिल मांगी। शुरुआत में उसने थोड़ी हिचकिचाहट दिखाई, लेकिन फिर उसने मुझे साइकिल दे दी। मैं साइकिल लेकर मोहल्ले के पास एक खाली मैदान में चला गया, जहां ज्यादा लोग नहीं थे।

पहली बार जब मैंने साइकिल पर बैठकर पैडल मारना शुरू किया, तो मेरा दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था। मुझे डर लग रहा था कि कहीं फिर से गिर न जाऊं। जैसे ही मैंने थोड़ा आगे बढ़ने की कोशिश की, मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं ज़ोर से जमीन पर गिर पड़ा।

मेरे घुटने में चोट लग गई। दर्द भी हुआ, और थोड़ा खून भी निकल आया। मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा। उस समय मेरा मन कर रहा था कि मैं सब छोड़ दूं और घर चला जाऊं।

लेकिन फिर मैंने खुद से कहा — “अगर आज हार मान ली, तो जिंदगी भर ऐसे ही खड़ा रहना पड़ेगा।”

मैं फिर से उठा, साइकिल उठाई, और दोबारा कोशिश करने लगा। दूसरी बार भी मैं ज्यादा दूर नहीं जा पाया और फिर गिर गया। तीसरी बार भी वही हुआ।

उस दिन मैं कई बार गिरा। हर बार चोट लगती, दर्द होता, लेकिन मैं फिर से उठकर कोशिश करता। शाम तक मैं बहुत थक चुका था, लेकिन अंदर से थोड़ा संतोष था कि मैंने हार नहीं मानी।

घर पहुंचा तो मम्मी ने मेरी हालत देखी। उन्होंने पूछा क्या हुआ, और जब उन्हें पता चला कि मैं साइकिल सीख रहा था, तो उन्होंने पहले डांटा, फिर दवा लगाई। उस रात मेरे घुटनों में बहुत दर्द था, लेकिन दिल में एक छोटी सी उम्मीद भी थी।

अगले दिन मैं फिर से मैदान गया। इस बार मैंने थोड़ा धीरे-धीरे चलाने की कोशिश की। मैंने ध्यान दिया कि संतुलन कैसे बनाना है। पहले मैं 2–3 सेकंड चला, फिर गिर गया। फिर 4–5 सेकंड चला, फिर गिर गया।

लेकिन इस बार कुछ अलग था। मुझे लग रहा था कि मैं थोड़ा-थोड़ा सीख रहा हूं।

मैं रोज सुबह या शाम को अभ्यास करने जाने लगा। धीरे-धीरे मेरा डर कम होने लगा। अब मैं पहले से ज्यादा समय तक साइकिल चला पाता था।

फिर एक दिन ऐसा आया, जब मैं बिना गिरे काफी दूर तक साइकिल चला गया। मुझे खुद यकीन नहीं हो रहा था कि मैं सच में साइकिल चला रहा हूं।

उस दिन मुझे जो खुशी हुई, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। मैं बार-बार साइकिल चलाता और खुद ही मुस्कुराता रहता।

अब जो लोग पहले मेरा मजाक उड़ाते थे, वही लोग मुझे देखकर चुप हो गए थे। कुछ तो कहने लगे, “अरे, अब तो तू अच्छा चला लेता है।” उनकी ये बात सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा।

अब मेरे मन में एक नई इच्छा जागी — मेरी अपनी साइकिल होनी चाहिए।

मैंने अपने पापा से साइकिल दिलाने की बात कही। शुरुआत में उन्होंने मना कर दिया और कहा कि अभी जरूरत नहीं है। लेकिन मैं रोज उनसे कहता रहा।

काफी दिनों तक मैंने जिद की। आखिरकार एक दिन पापा मान गए और मुझे बाजार ले गए।

जब मैंने अपनी नई साइकिल देखी, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वो साइकिल मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं थी।

उस दिन के बाद मैं रोज अपनी साइकिल लेकर बाहर निकलता था। कभी दोस्तों के साथ घूमने जाता, कभी अकेले ही दूर तक चला जाता।

मुझे लगने लगा था कि अब सब कुछ सही है। अब मुझे किसी चीज़ से डर नहीं लगता था।

एक दिन शाम के समय मैं अपनी नई साइकिल लेकर थोड़ा दूर निकल गया। मैं तेज़-तेज़ साइकिल चला रहा था और हवा मेरे चेहरे से टकरा रही थी।

मुझे बहुत मजा आ रहा था। मैं इतना खुश था कि मुझे आसपास की चीजों का ध्यान ही नहीं रहा।

तभी…

अचानक सामने कुछ ऐसा हुआ, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी…

मैंने तुरंत ब्रेक लगाने की कोशिश की…

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी…

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